Friday, December 26, 2014

हाय आबादी

रात की नींद और दिन का चैन हर सुख हुआ हराम 
हाय ! आबादी बनी बर्बादी दुर्लभ हुआ आराम /
.
सोचा न समझा ,
खड़ा किया परिवार बड़ा 
मुश्किल पेट की पूजा हो गई ,
बोझ धरा पे भी बढ़ा 
सुबह-ओ-शाम  और रात - ओ -दिन 
रात - ओ -दिन और सुबह -ओ -शाम 
घर में मच रहा कोहराम 
दुर्लभ हुआ आराम .....................
.
बचे न एक भी पैसा 
खर्च बढ़ा है  इतना ऐसा 
उम्र है जो कि पढने की 
साथियों संग हंसने की और लड़ने की 
उसी उम्र में करे है बच्चा मजदूरी व काम 
दुर्लभ हुआ आराम ..........................
.
कुछ ही उमरिया लगे है बूढा 
चिंता खाए सोच सताए 
सब कुछ लगे है कूढा 
रंग न भाये राग न भाये 
हाय ! जीवन में कब आये विराम 
दुर्लभ हुआ आराम ........................
.
कहना मनो राज़ का 
देखो समाज आज का 
निज गुलशन में गुल रखना दो ही भाई 
लड़की हो या लड़का तुम कराना खूब पढाई 
पढ़ के लिख के जग में तुम्हारा , करेंगे रौशन नाम 
मिल जायेगा हर आराम -मिल जायेगा हर आराम 

.
                                                                     राज़ 

No comments:

Post a Comment