Saturday, December 27, 2014

गुस्सा

                               गुस्सा  
जो गुस्से को मारा होता ,
ना  ये हाल तुम्हारा होता ,
लुट गए घर परिवार ,
हुए बर्बाद बेटी - बेटे ,
खो गई सब चमक गुमानी ,
भूल गया अब सारी ऐठें ,
ख़ुशी चादर बिछाती ,
लक्ष्मी चंवर झुलाती ,
जो अकड़ को मारा होता ,
ना ये हाल .....................
.
क्षण भर में ख़त्म ये गुस्सा ,
पर पोतों को जंजाल बना ये किस्सा ,
अदालत खर्चा हाई - फाई ,
लुट गई सारी हाय कमाई ,
जो थोडा सा विवेक धारा होता ,
जो ज्वाला में जल मारा होता ,
ना ये हाल .....................
.
रो रही आज सारी पीढ़ी ,
चढ़ते रोज़ अदालत सीढ़ी ,
हर किसी के नखरे सहते ,
चाहकर भी तुम कुछ ना कहते ,
गर यही गुस्सा उस वक़्त मारा होता ,
सुखी संसार ,घर परिवार तुम्हारा होता./ 
.
.
                                                                  राज़         

No comments:

Post a Comment