Friday, December 26, 2014

नशा बनाम नाश

नशा है करता नाश उसी का 
जिसने है समझा जरिया ख़ुशी का /
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कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी, निशि-दिन जो भी कमाया 
थोड़ी थोड़ी जो भी जोड़ी ,लुट गई जिसने गले लगाया 
घर बना है मैदान जंग-ए-कशीं का 
जिसने है समझा .............................................
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घर भूल संसार को भूला 
बच्चे भूला परिवार को भूला 
शौक की खातिर अपने उसने 
मुंह से लगाया इसको जिसने 
कर दिया खून घर की हँसी का 
जिसने है समझा .............................................
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पल पल उसकी गलती काया 
जेब से उसके जाती माया 
खोके विवेक और होक अँधा 
करता तैयार खुद ही फंदा 
खुशियाँ रोतीं रोना अपनी बे-बसी का 
जिसने है समझा .............................................
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बीवी रोती , सास रोती ,
बाप रोता ,मात रोती ,
जायदाद बिकी और बिक गई कोठी ,
मोहताज़ हुआ अब , न मिलती रोटी 
खून के आंसू रोता है ,होके  दिल अब दुखी सा 
जिसने है समझा .............................................
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                                                                      राज़ 

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