Saturday, December 27, 2014

नारी

बाद महीने नौ एक शिशु सदन में आया था ,
आने से पहले उसके सबका जी हर्षाया था ,
पर उतर गया है दादी माँ का चेहरा 
बाप के भी मुख पे शोक है बैठा गहरा 
क्या इतनी ही अगुन होती है नारी 
मैं तो कहता हूँ सबसे सुन्दर है वो कृति प्यारी
नहीं अगुन नहीं होती है नारी 
.
सोच के देख ले आज वो बाप 
जिसे लगे है लड़की श्राप 
क्यूँ कर वो दुनिया आया 
क्या नहीं उसी से उसने जन्म है पाया 
क्या नहीं है उसको अपनी माता प्यारी 
नहीं अगुन नहीं......................
.
है मूर्ख अज्ञानी जो ठहराये नारी जिम्मेदार 
नहीं अरे नहीं है कोई ,खुद ही है वो जिम्मेदार 
खुद उसके बिना न पैदा होनी 
तो क्या ठीक है ? नारी की इज्जत खोनी 
है गुल लड़की , जो महका दे फुलवारी 
नहीं अगुन नहीं......................
.
आने से पहले जग में , जो मारे 
जरा सोच ले मेरी बात विचारे 
क्या तू दुनिया में आना था 
जो किया है दुष्कर्म तूने 
गर नाना ने तेरे कर जाना था 
सोच के अब क्यूँ कांप रही रूह तुम्हारी 
नहीं अगुन नहीं......................
.
लड़की है घर में भाग्य ये मानो 
धुरी है जग की बुरा ना जानो 
सब दानों में महादान तुम 
जान लो कन्या-दान है तुम 
सीता पालो उसी तरह से जैसे पाले तुम बिहारी 
नहीं अगुन नहीं......................
.
.
                                                                 राज़ 

No comments:

Post a Comment